Monday, November 19, 2018

Bjp k haath se nikal gya Rajasthan Congress ki jeet pakki

नमस्कार दोस्तों आज हम आपको बताने जा रहे है कि कैसे राजसथान में कांग्रेस की जीत पक्की हो गयी है। भाजपाशासित राज्य राजस्थान में विधानसभा चुनाव की लड़ाई काफी जबरदस्त हो चुकी है। राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे झालरापाटन विधानसभा सीट से उम्मीदवार हैं, जहां से वह साल 2003 से ही लगातार चुनाव जीतती रही हैं। लेकिन इस बार इस सीट पर वसुंधरा का मुकाबला कांग्रेसी उम्मीदवार मानवेंद्र सिंह से हैं।


आपको बता दें कि मानवेंद्र सिंह बीजेपी के पूर्व नेता और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे बीजेपी के दिग्गज नेता जसवंत सिंह के बेटे हैं। जिन्होंने बीजेपी और वसुंधरा राजे से नाराजगी के बाद 22 सितंबर को बीजेपी से अलग होने का बड़ा फैसला किया था और फिर मानवेंद्र सिंह ने कांग्रेस पार्टी का हाथ थाम लिया।

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जिसके बाद अब राजस्थान में बड़ा दांव खेलते हुए कांग्रेस पार्टी वसुंधरा के खिलाफ मानवेंद्र सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है, जिनकी राजपूत वोट पर अच्छी पकड़ मानी जाती है। इस लिहाज से वसुंधरा और सिंह के खिलाफ कांटे की टक्कर दिख रही है।

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अपनी उम्मीदवारी को लेक सिंह ने कहा कि मैंने राहुल जी से लोकसभा चुनाव लड़ने की बात की थी लेकिन पार्टी ने मुझ पर भरोसा जताया है तो मैं इसके लिए भी तैयार हूं। उन्होंने कहा कि मैंन कभी वसुंधरा के खिलाफ चुनाव लड़ने की मांग नहीं कि लेकिन ये फैसला पार्टी का है, इसलिए मैं तैयार हूं।

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गौरतलब हो कि मानवेंद्र सिंह और उनके पिता जसवंत सिंह बीजेपी के दिग्गज नेताओं के तौर पर पहचाने जाते थे, लेकिन पिछले काफी दिनों से बीजेपी से नाराज चल रहे थे। पिछले चार सालों से वह कोमा में हैं। वह किसी को पहचान भी नहीं पाते। लेकिन पूर्व पीएम वाजपेयी के साथ उनकी जुगलबंदी आज भी लोगों के जेहन में घर किए हुए है।

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Khud k hi bayaan mein phas gye pm modi ho gyi badi samasya

नमस्कार, दोस्तों आज हम आपको बताने जा रहे है कि कैसे मोदी जी अपने ही बयान में उलझ गए। अपने ही बयान में उलझ गये हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। उन्होंने मान लिया है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस में लोकतांत्रिक प्रणाली विकसित की थी। आप चौंक जाएंगे। ऐसा कैसे हो सकता है! मोदी! और, वो जवाहरलाल नेहरू की क्षमता को मान लें! लेकिन यही सच है! इस सच को महसूस करने के लिए आपको करना होगा थोड़ा इंतज़ार।

नरेंद्र मोदी ने अम्बिकापुर में कांग्रेस को 5 साल के लिए नेहरू-गांधी परिवार से इतर व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने की चुनौती दे डाली, जबकि खुद बीजेपी का संविधान ऐसा करने की इजाजत नहीं देता। बीजेपी में दो साल का लगातार दो कार्यकाल ही हो सकता है। अमित शाह के लिए यह नियम तोड़ा गया है। तस्वीर न्यूज़रूम पोस्ट।

सबसे पहले आप ये जानिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर में रैली को संबोधित करते हुए कहा क्या-

“अगर आपके भीतर लोकतंत्र की इतनी ही परंपरा है तो एक बार बस पांच साल के लिए गांधी परिवार के बाहर किसी व्यक्ति को पार्टी अध्यक्ष बना दें।"

मोदी ने आगे यह भी जोड़ दिया कि ऐसा होने पर ही उन्हें विश्वास होगा कि जवाहरलाल नेहरू ने वहां लोकतांत्रिक प्रणाली विकसित की थी।

आश्चर्य की बात ये है कि खुद बीजेपी का संविधान यह अनुमति नहीं देता कि कोई नेता पार्टी अध्यक्ष के तौर पर 5 साल लगातार अपने पद पर बने रहे। दो से अधिक के कार्यकाल की इजाजत नहीं पार्टी का संविधान नहीं देती है। यह बात अलग है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने इस संविधान में संशोधन कर डाला है और उसी हिसाब से अमित शाह के कार्यकाल को विस्तार दे दिया गया है। बीजेपी में अब तक 38 साल में 13 नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाई है।

सवाल ये है कि जब बीजेपी खुद लगातार 5 साल के कार्यकाल को अलोकतांत्रिक मानती है तो वह कांग्रेस को अलोकतांत्रिक होने की चुनौती कैसे दे सकती है? अब तो बात समझ में आ रही होगी कि नरेंद्र मोदी ने कितनी बड़ी गलतबयानी कर डाली है।

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Bharat - Australia k bich hua ye 10 vivaad , kohli bhi the shaamil

भारत और ऑस्ट्रेलिया जब भी क्रिकेट के मैदान पर भिड़ते हैं तो बात सिर्फ गेंद और बल्ले की नहीं होती. मामूली तू-तू मैं-मैं से लेकर अंपायर के फैसलों पर विवाद, अकसर ही सुर्खियों का हिस्सा बन जाती है. इन विवादों ने दोनों देशों के बीच की प्रतिस्पर्धा का रोमांच ही बढ़ाया है. आइए एक नजर भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 10 विवादों पर.
जब सुनील गावस्कर को गुस्सा आ गया
1981 के मेलबर्न टेस्ट में भारत की जीत एक अजीबो गरीब कारण से सुर्खियों में आ गई थी. सुनील गावस्कर अंपायर के फैसले से इतने नाराज हो गए कि अपने साथी बल्लेबाज चेतन चौहान को लेकर पवेलियन लौट आए. दरअसल, अंपायर रेक्स व्हाइटहेड ने डेनिस लिली की गेंद पर सुनील गावस्कर को एलबीडबल्यू आउट करार दिया. लिटिल मास्टर फैसले से खुध नहीं थे, नाराज होकर दूसरे छोर पर मौजूद चौहान को पवेलियन वापस लौट चलने को कहा. चौहान ने भी अपने कप्तान की बात मानी. स्थिति बिगड़ता देख भारतीय टीम मैनेजमेंट तुरंत एक्शन में आई. चेतन चौहान को दोबारा मैदान पर भेजा गया. इस वाकये के बारे में गावस्कर ने बाद में बताया कि उनकी नाराजगी फैसले से नहीं बल्कि लिली द्वारा की गई निजी टिप्पणियों से थी.
माइकल स्लेटर की बदजुबानी
2001 का मुंबई टेस्ट बिल्कुल ही एक तरफा रहा, ऑस्ट्रेलिया ने भारत को धो डाला. लेकिन एक वाकये ने खेल का मजा किरकिरा कर दिया. राहुल द्रविड़ ने पुल शॉट खेला, मिस्टाइम होने की वजह से गेंद हवा में चली गई जिसे माइकल स्लेटर ने डाइव लगाकर लपक लिया. द्रविड़ कैच से संतुष्ट नहीं थे इसलिए वह क्रीज पर रुके रहे. पूर्व अंपायर एस वेंकटराघवन ने भी उन्हें नॉट आउट करार दिया. टीवी रिप्ले भी यही बता रहे थे कि स्लेटर के दावों से उलट इस कैच को लेकर कुछ शंकाएं थीं. इन सबके बीच स्लेटर अपना आपा खो बैठे और अंपायर से बहस करने लगे. इसके बाद उन्होंने द्रविड़ के साथ गाली गलौज भी की. इस व्यवहार के लिए स्लेटर पर जुर्माना लगाया गया.
मैकग्रा के बाउंसर पर तेंदुलकर एलबीडबल्यू आउट
ऑस्ट्रेलिया में 1999-00 सीरीज को सचिन तेंदुलकर बनाम ग्लेन मैकग्रा के तौर पर देखा जा रहा था. मैकग्रा सीरीज तो कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके थे कि वह सचिन को आउट करेंगे. एडिलेड टेस्ट में मैकग्रा ने सचिन को अपना शिकार बनाया भी, पर विवाद यह था कि अंपायर डेरल हार्पर ने मास्टर ब्लास्टर को एक बाउंसर गेंद पर पगबाधा आउट करार दिया था. हुआ यूं की मैकग्रा ने बाउंसकर फेंका, पर गेंद थोड़ी नीची रही. बाउंसर समझकर तेंदुलकर गेंद से बचने की कोशिश कर रहे थे जिस दौरान यह उनके कंधे से जा टकराई. मैकग्रा ने अपील किया और सचिन आउट करार दिए गए. इस फैसले ने विवाद को जन्म दे दिया. क्रिकेट जगत से लेकर फैंस के बीच इस फैसले पर जमकर चर्चा हुई.
टॉस के वक्त देरी से पहुंचते थे गांगुली!
2001 के ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज के दौरान दोनों देशों के बीच एक अजीब सा तनाव था. बाद में पता चला कि इसकी वजह टॉस पर गांगुली का बार-बार लेट पहुंचना था. तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव वॉ ने अपनी आत्मकथा 'आउट ऑफ माइ कंफर्टजोन' में खुलासा किया कि गांगुली बार-बार टॉस पर लेट आते. उन्होंने आरोप लगाया कि गांगुली ने वनडे और टेस्ट सीरीज के दौरान कुल 7 बार ऐसा किया. हालांकि गांगुली ने कई सालों बाद इस मामले पर चुप्पी तोड़ी. उन्होंने कहा कि वह जानबूझकर ऐसा नहीं करते थे.
कुंबले का बाउंसर
2008 के विवादित सिडनी टेस्ट के बाद भारतीय कप्तान अनिल कुंबले खासे नाराज थे. उन्होंने यहां तक कह दिया कि मैदान पर सिर्फ एक टीम खेल के भावना के साथ खेल रही थी. यह मैच भारत-ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट इतिहास में सबसे विवादित मैचों से एक है. दरअसल. यह टेस्ट घटिया अंपायरिंग और मंकीगेट विवाद के कारण सुर्खियों में रहा. अंपायर द्वारा मैच के दौरान कई गलत फैसले किए गए जिसका खामियाजा भारत को भुगतना पड़ा. इस दौरान ऑस्ट्रेलियाई टीम का भी रवैया सवालों के घेरे में रहा.
सायमंड्स-हरभजन मंकीगेट विवाद
शायद किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि एंड्रयू सायमंड्स और हरभजन सिंह के बीच हुई मामूली बहस ऐसा रूप अख्तियार कर लेगी कि बात भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे से वापस लौटने तक पहुंच जाएगी. ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज का आरोप था कि ऑफ स्पिनर ने उन्हें मंकी (बंदर) कहा था और यह नस्लभेदी है. मामला सिडनी कोर्ट तक पहुंच गया. आरोपों की जांच के लिए एक अनुशासनात्मक पैनल का गठन किया गया. इस दौरान ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ने भज्जी के बारे में उल्टी-सीधी बातें लिखी गई वहीं बीसीसीआई ने तो दौरे को बीच में ही खत्म करने की धमकी दे डाली. हरभजन पर पहले तीन टेस्ट मैच का बैन लगा जिसे बाद में हटा लिया गया. 
क्या गंभीर ने वाटसन को जानबूझकर कोहनी मारी?
2008 में ऑस्ट्रेलिया का भारत दौरा बड़े विवादों से दूर रहा. पर दिल्ली टेस्ट के दौरान कुछ ऐसा हुआ जिसने एक बार फिर दोनों टीम के खिलाड़ियों के रिश्तों में खटास पैदा करने का काम किया. टेस्ट मैच के दौरान गौतम गंभीर को कंगारुओं ने अपनी स्लेजिंग का शिकार बनाया, खासकर ऑल राउंडर शेन वाटसन ने. इससे नाराज गंभीर ने दो रन लेने के दौरान वाटसन को कोहनी मार दी. उन्होंने ऐसा जानबूझकर किया था, इसका कोई सबूत नहीं है. लेकिन मैच रेफरी ने मामले पर कार्रवाई की और दोहरा शतक जड़ने वाले गंभीर को अगले मैच के लिए बैन कर दिया गया. 
जहीर ने लांघी लक्ष्मण रेखा
2008 में मोहाली टेस्ट में हरभजन ने मैथ्यू हेडन को आउट किया तो भारतीय खिलाड़ी जश्न मनाने लगे. इस दौरान जहीर कुछ अजीब ही अंदाज में सेलिब्रेट करने लगे. हेडन चुपचाप पवेलियन की ओर लौट गए, पर मैच रेफरी क्रिस ब्रॉड चुप नहीं रहे. उन्होंने जहीर खान के इस व्यवहार को खेल भावना के खिलाफ बताते हुए उनपर मैच फीस का 80 फीसदी जुर्माना लगाया.
जब उलझ पड़े जहीर और पोंटिंग
2010 में मोहाली टेस्ट के दौरान जहीर और रिकी पोंटिंग के बीच हुई बहस ने सीरीज का तापमान बढ़ाने का काम किया. रन आउट होने के बाद पोंटिंग ड्रेसिंग रूम की ओर बढ़ रहे थे. इस दौरान जहीर ने पोंटिंग पर कुछ टिप्पणी की जिससे वह नाराज हो गए. वह पीछे मुड़े और जहीर के पास आकर कुछ कहने लगे. दोनों खिलाड़ियों के बीच थोड़ी देर बहस भी हुई, हालांकि अंपायर बिली बॉडेन ने पूरा मामला संभाल लिया.
जब विराट ने मिडिल फिंगर दिखाई
2011-12 में भारत का ऑस्ट्रेलिया दौरा प्रदर्शन के लिहाज से बेहद ही खराब रहा. साथ ही विराट कोहली के व्यवहार ने खेल का मजा किरकिरा करने का काम किया. सीरीज के दूसरे टेस्ट से कोहली की एक तस्वीर सामने आई जिसमें उन्हें पवेलियन में मौजूद दर्शकों को मिडिल फिंगर दिखाते हुए देखा जा सकता था. इस व्यवहार के कारण विराट कोहली पर मैच फीस का 50 फीसदी जुर्माना लगाया गया. अपनी बात कहने के लिए विराट कोहली ने ट्विटर का इस्तेमाल किया. उन्होंने ट्वीट किया था, 'मैं मानता हूं कि क्रिकेटरों को प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए. लेकिन जब दर्शक आपकी मां और बहन के बारे में बेहद ही भद्दी टिप्पणी करें, तब क्या?' 

Chhattisgarh mein bjp aur Congress k chunav abhiyaan mein kya farak dikhta hai??

छत्तीसगढ़ में सुबह और शाम को बढ़ती ठंडक के बीच सियासी पारा चरम पर है. सूबे के पहले चरण में 18 सीटों पर मतदाता उम्मीदवारों की किस्मत को ईवीएम में लॉक कर चुके हैं. अब मंगलवार को बाकी 72 सीटों का फैसला होना है. प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर 18 साल के इस नौजवान राज्य की कमान किन हाथों में जाएगी, यह 11 दिसंबर को ही पता चल पाएगा. उसी दिन अन्य चार राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजे भी घोषित होने हैं. फिलहाल अपनी-अपनी तैयारियों के साथ राजनीतिक दल 1.85 करोड़ मतदाताओं के बीच हैं.

तैयारियों की बात करें तो अन्य राजनीतिक दलों के मुकाबले सत्ताधारी भाजपा कहीं आगे दिखती है. सूबे की राजधानी रायपुर सहित तमाम बड़े शहरों में जगह-जगह उसके होर्डिंग और पोस्टर लगे हुए है. इनमें मुख्य चेहरा रमन सिंह को ही बनाया गया है. वहीं, प्रचार वाहनों के जरिए भी मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश की जा रही है. इसके अलावा पार्टी के स्टार प्रचारक पूरे राज्य में जनसभाएं कर पार्टी को लगातार चौथी बार सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने की तैयारी में हैं. इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ कई अन्य केंद्रीय मंत्री शामिल हैं. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ भी सूबे के लोगों को भाजपा के साथ लाने की कोशिश में हैं. भाजपा के स्टार प्रचारक नरेंद्र मोदी ने यहां तीन बड़ी जनसभाओं को संबोधित किया है. आम तौर पर एक दिन में उनकी एक ही जनसभा रखी गई थी.

दूसरी ओर, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक दिन में चार जनसभाओं को संबोधित करते हुए दिखे. इसकी बड़ी वजह राज्य में रमन सिंह के मुकाबले कांग्रेस के पास कोई चेहरा न होना है. यहां तक कि अब तक पार्टी की ओर यह भी साफ नहीं किया गया है कि अगर वह जीती तो कमान किसके हाथ जाएगी. इस बात को भाजपा ने चुनाव में लगातार मुद्दा बनाकर रखा. साथ ही, इस वजह से कांग्रेस के चुनावी अभियान का पहिया राहुल गांधी की धुरी पर ही घूमता दिखा.

कांग्रेस के होर्डिंगों और पोस्टरों की बात करें दो तरह के होर्डिंग दिखे. इनमें एक पार्टी की ओर से लगाया गया है जिनमें राहुल गांधी और सोनिया गांधी की तस्वीर के साथ कांग्रेस का कोई एक चुनावी वादा है. इनमें पार्टी के स्थानीय उम्मीदवार कहीं नहीं दिखते. वहीं, कांग्रेसी प्रत्याशियों की ओर से लगाए गए होर्डिंग से पार्टी नेतृत्व गायब है.

भाजपा और कांग्रेस के बीच चुनावी अभियान को लेकर अंतर होर्डिंगों और पोस्टरों को लेकर ही नहीं अन्य मामलों में भी दिखा. नरेंद्र मोदी की जनसभाओं के लिए बड़े स्तर पर तैयारी की गई. ध्यान रखा गया कि उनकी जनसभाओं में अधिक से अधिक लोग पहुंच पाएं. इसके लिए गांवों तक के स्थानीय पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगाया गया. इनका काम लोगों को वाहनों से जनसभा स्थल तक पहुंचाना और फिर वापस उनके गांव ले जाना था. साथ ही, इन्हें नाश्ता-पानी की भी व्यवस्था करनी होती थी. जनसभा स्थल पर अच्छी-खासी व्यवस्था की गई. लोगों के लिए न केवल पर्याप्त संख्या में कुर्सियां रखी गईं बल्कि उनको धूप से बचाने के लिए पंडाल की भी व्यवस्था रही. लोगों को पार्टी के नाम की टोपियां और अन्य चीजें बांटीं गईं.

वहीं, बिलासपुर की जनसभा में हमने देखा कि नरेंद्र मोदी और उनकी बातों को करीब डेढ़-दो दर्जन स्क्रीनों के जरिए दूर-दूर बैठे लोगों तक पहुंचाया जा रहा था. उनकी ‘चुनाव की बात’ को पूरे देश के लोगों तक पहुंचाने की भी व्यवस्था भी थी. इन जनसभाओं का सोशल मीडिया पर लाइव प्रसारण हुआ. इस काम से जुड़े एक कैमरामैन ने हमें बताया कि उनका काम सारे चैनल्स को लाइव फीड भी देना होता है. जनसभा स्थल तक पहुंचने के लिए लोगों को कड़ी सुरक्षा जांचों का सामना करना पड़ा. कई लोग इस वजह से भी नरेंद्र मोदी को देखने से महरूम रहे कि वे सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते थे.

वहीं, जब हम राहुल गांधी की जांजगीर-चांपा की रैली कवर करने पहुंचे तो जनसभा से एक-दो किलोमीटर पहले कई लोग पैदल जाते हुए दिखे. इनमें से अधिकांश के पीछे कोई पार्टी नेता या कार्यकर्ता नहीं थे. वहीं, दो-चार पहिए के जरिए भी बड़ी संख्या में धीरे-धीरे लोग पहुंच रहे थे. सभा स्थल को कड़ी धूप से बचाने के लिए पंडाल की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी. धूल की वजह से भी लोग काफी परेशान दिखे. यहां नरेंद्र मोदी की जनसभा की तरह कोई पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था नहीं थी. कई बार हमने खुद मंच संचालकों को यह कहते सुना कि उस गेट से सीधे अंदर आ जाइए, कोई सुरक्षा जांच नहीं होगी. जब हम जनसभा स्थल के अंदर पहुंचे तो अपना परिचय देने पर पुलिसकर्मियों द्वारा न तो प्रेस कार्ड मांगा गया और न ही बैग की कोई तलाशी ली गई.

राहुल गांधी के जनसभा स्थल में पहुंचने की बात की जाए तो बड़ी संख्या में लोग आस-पास के गांव से खुद जुटे थे. इनमें कई महिलाएं भी थीं जो कड़ी धूप में बच्चों के साथ राहुल गांधी के आने का इंतजार कर रही थीं. इसके अलावा जनसभा स्थल के आस-पास का माहौल गांव के किसी मेले की तरह लग रहा था. वहां खाने-पीने के लिए अस्थाई दुकानें भी लगी हुई थीं. इससे पहले हमने नरेंद्र मोदी की सभा में सरकार की ओर से निशुल्क स्वास्थ्य शिविर देखा था. वहां मुफ्त में दवाइयां भी बांटी जा रही थीं. उधर, कांग्रेस की इस जनसभा में सरकार की ओर से कोई स्वास्थ्य शिविर नहीं लगाया गया था. वहीं, पुरुष और महिलाएं अलग-अलग छोटे समूह में बैठे हुए थे.

इन सभी को राहुल गांधी के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा. जब वे पहुंचे तो उपस्थित लोगों को हेलिकॉप्टर की लैंडिंग की वजह से धूल का भी सामना करना पड़ा. इससे पहले नरेंद्र मोदी की सभा में पहुंचने वालों की ऐसी किसी भी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा था. इसके बाद जब राहुल गांधी मंच पर आए तो काफी जल्दबाजी में दिखे. हालांकि, कई मामलों में वे पहले से कहीं बेहतर लग रहे थे. अपने भाषण में वे भी नरेंद्र मोदी की तरह लोगों से मुद्दों को कनेक्ट करने की कोशिश करते दिखे. उनके पूरे भाषण के दौरान जांजगीर-चांपा क्षेत्र के सभी छह पार्टी प्रत्याशी मंच पर खड़े रहे. इससे एक दिन पहले बिलासपुर की रैली में नरेंद्र मोदी ने भी एक-एक कर सभी पार्टी उम्मीदवारों को अपने साथ- मंच पर कमल के निशान के साथ बुलाया था. लेकिन, इसके तुरंत बाद ही उन्होंने उम्मीदवारों से कहा, ‘विराजिए.’ इसके बाद सभी अपनी-अपनी कुर्सी पर बैठ गए थे.

भाषण की बात की जाए तो नरेंद्र मोदी ने राज्य सरकार से अधिक केंद्र सरकार की उपलब्धियों पर जोर दिया. इसके लिए उन्होंने केंद्र प्रायोजित योजनाओं का जिक्र किया. साथ ही, गांधी परिवार और पिछली यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार को लेकर निशाने साधे. 2014 से लेकर अब तक के चुनावी अभियानों में ‘गरीबी’, ‘चाय वाला’ और ‘राज परिवार’ जैसे शब्द उनके भाषण का ‘कीवर्ड’ बने हुए हैं. वहीं किसान और रोजगार जैसे शब्द उनके भाषण में यदा-कदा ही सुनाई दिए.

वहीं, राहुल गांधी भी अनिल अंबानी, नीरव मोदी और विजय माल्या के जरिए मोदी सरकार पर जवाबी हमला करते दिखे. उन्होंने लोगों को यह आश्वासन भी दिया कि अगर उनकी सरकार आई तो चुनावी वादों को पूरा किया जाएगा. उन्होंने जनसभा में मौजूद लोगों को रफाल सौदे में कथित गड़बड़ी को समझाने की कोशिश की लेकिन, यह बात कइयों के सिर के ऊपर से निकलती दिखी. कांग्रेस अध्यक्ष भाषण के दौरान एक मुद्दे से दूसरे पर कूदते भी दिखे. ऐसा लग रहा था कि उनके पास मतदाताओं से कहने के लिए काफी कुछ है लेकिन, वक्त नहीं है. नरेंद्र मोदी के ठहराव के उलट राहुल गांधी के भाषण में हड़बड़ी दिखी.

हालांकि, राहुल गांधी को देखने और सुनने गए लोगों में किसी तरह की हड़बड़ी नजर नहीं आई. उनका भाषण खत्म होने के बाद भीड़ जनसभा स्थल से आराम से निकलती दिखी. लोगों ने न तो वहां लगे पार्टी के झंडे उतारे और न कटआउट. वहीं, नरेंद्र मोदी की सभा के बाद लोगों में बाहर निकलने की काफी हड़बड़ी दिखी. उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे उन्हें कहीं जाने की हड़बड़ी है या फिर उन्हें वहां जबरन रखा रखा गया था.

Amit shah ne liya bahut bada faisla nikaal diya party k sabse bade neta ko

नमस्कार दोसतो आज हम आपको बताने जा रहे है कि अमित शाह ने पार्टी से किन बड़े नेताओं को पार्टी से निकाल दिया। भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश चुनाव से पहले एक बहुत बड़ा फैसला ले लिया। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के फैसले के बाद भाजपा में हाहाकार मच गया है। पार्टी ने शनिवार को एक साथ 53 नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इनमें कई बड़े नाम भी शामिल हैं। आइए जानें किस वजह से ये बड़ा फैसला लिया गया है।


बुधवार को ही फाइनल हो गए थे नाम

जी मीडिया की खबर के मुताबिक भाजपा ने जिन नेताओं का पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया है, उनके नाम बुधवार देर रात मीटिंग में ही तय कर लिये गये थे। ये वो प्रत्याशी हैं जो बागी हो गए हैं और भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ ही मध्य प्रदेश चुनाव में खड़े हो रहे हैं।

मध्य प्रदेश भाजपा के कई बड़े नाम शामिल

एमपी भाजपा से बाहर किए गए नेताओं में प्रदेश के बड़े -बड़े नाम शामिल हैं। इनमें सरताज सिंह, नरेंद्र कुशवाह, समीक्षा गुप्ता, रामकृष्ण कुष्मारिया, लता मस्की, धीरज पटेरिया, राजकुमार यादव के नाम शामिल हैं। इन सबको पार्टी से बगावत की सजा मिली है।

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Rakesh singh ko sunne pahuche 30 se kam log kaaryakarta par phuta gussa utaar di mala

मंडला। जिले में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की चुनावी सभा सिंगारपुर में आयोजित की गई, जिसमें मुठ्ठी भर लोग ही थे. ये देख प्रदेशाध्यक्ष का पारा चढ़ गया. उनके संबोधन के दौरान एक कार्यकर्ता मंच पर जैसे ही माला पहनाने पहुंचा प्रदेश अध्यक्ष चिढ़ गये और माला उतार दी.

मंडला जिले की निवास विधान सभा में राकेश सिंह की सभा.

मंडला। जिले में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की चुनावी सभा सिंगारपुर में आयोजित की गई, जिसमें मुठ्ठी भर लोग ही थे. ये देख प्रदेशाध्यक्ष का पारा चढ़ गया. उनके संबोधन के दौरान एक कार्यकर्ता मंच पर जैसे ही माला पहनाने पहुंचा प्रदेश अध्यक्ष चिढ़ गये और माला उतार दी.

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह जब प्रचार के लिए मंडला पहुंचे तो सभा स्थल पहुंचते उनकी पेशानियों पर बल पड़ गए और वे अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर भड़क गए. राकेश सिंह की इस झल्लाहट का कारण चुनावी भाग-दौड़ की थकान नहीं, बल्कि उनकी सभा में मौजूद मुठ्ठीभर लोग हैं. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की सभा का ये हाल मंडला के सिंगापुर गांव में हुआ.
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खाली मैदान और कुर्सियां देख राकेश सिंह ने महज दो मिनट में अपना भाषण पूरा कर दिया. खाली मैदान देख राकेश सिंह का गुस्सा इस कदर भड़का कि जब उनके स्वागत में एक कार्यकर्ता ने माला पहनाई तो उन्होंने उसे भी उतार फेंका. इसके बावजूद राज्यसभा सांसद संपतिया उईके, प्रदेश अध्यक्ष के इस दौरे को प्रभावशाली मानती हैं, मानें भी क्यों न आखिर पार्टी के अध्यक्ष जो हैं. हालांकि उन्होंने लोगों के आने की एक वजह हेलिकॉप्टर को बताकर राकेश सिंह के प्रभाव को खुद ही कम कर दिया.
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संपतिया उईके की मानें तो यहां आए लोग राकेश सिंह के साथ ही हेलिकॉप्टर देखने भी आए थे. अब ये वही बता सकती हैं कि 30 से 40 लोगों की भीड़ में कितने लोग राकेश सिंह के प्रभाव से आए और कितने हेलिकॉप्टर देखने